उत्तर प्रदेश मे. जंगल राज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है ; ‘उत्तर प्रदेश के किसी भी ज़िले में क़ानून का पालन नहीं हो रहा है। एक भी ऐसा मामला नहीं मिला जहाँ क़ानून या सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन किया जा रहा हो । पुलिस अधिकारी जो सर्विस में नए हैं जजों पर ख़ासकर जिला अदालतों में, दबाव डाल रहे हैं।’
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यूपी पुलिस को कड़ी फटकार 🚨⚖️
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने शुक्रवार को
👉 उत्तर प्रदेश पुलिस के रवैये पर
👉 गंभीर चिंता जताते हुए
👉 सख़्त शब्दों में चेतावनी दी।
🧑⚖️ न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने स्पष्ट कहा—
🗣️ “अदालत उत्तर प्रदेश को पुलिस राज्य नहीं बनने दे सकती।”
यह टिप्पणी
📌 डीजीपी राजीव कृष्णा
📌 अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद
की मौजूदगी में हुई वर्चुअल सुनवाई के दौरान की गई।
📌 कोर्ट की प्रमुख आपत्तियाँ
⚠️ पुलिस अधिकारी, विशेषकर युवा अफ़सर,
➡️ न्यायिक अधिकारियों
➡️ खासकर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM)
पर
❗ अपने पक्ष में आदेश दिलाने का नियमित दबाव बना रहे हैं।
❗ कोर्ट ने कहा—
🗣️ “मुझे ऐसा एक भी मामला नहीं मिला,
जहाँ कानून या सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का सही पालन हुआ हो।”
🔫 ‘हाफ एनकाउंटर’ पर सवाल
अदालत ने
👉 आरोपियों के पैरों में गोली मारने
👉 हथियारों के अनावश्यक इस्तेमाल
की बढ़ती प्रवृत्ति पर भी
📢 जवाब माँगा।
⚖️ न्यायपालिका पर दबाव की गंभीर स्थिति
📌 कोर्ट ने बताया कि—
🔹 जब न्यायाधीश पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हैं
🔹 तो जिला पुलिस प्रमुखों और न्यायिक अधिकारियों में टकराव आम हो गया है
🧑⚖️ एक मामले में तो
➡️ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का तबादला
➡️ सिर्फ़ इस टकराव को रोकने के लिए करना पड़ा।
❗ अदालत ने साफ किया कि
➡️ यह समस्या किसी एक ज़िले तक सीमित नहीं
➡️ ज़्यादातर ज़िलों से यही शिकायत सामने आई है।
📜 कोर्ट का स्पष्ट संदेश
✔️ कानून पुलिस से ऊपर है
✔️ न्यायिक स्वतंत्रता से कोई समझौता नहीं
✔️ दबाव, धमकी या मनमानी स्वीकार नहीं
🗣️ “अगर आदेश पुलिस के पक्ष में न हों,
तो न्यायिक अधिकारियों पर दबाव बनाना
लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक है।”
⚠️ यह चेतावनी क्यों अहम है?
👉 पुलिस की जवाबदेही तय करने के लिए
👉 न्यायपालिका की स्वतंत्रता बचाने के लिए
👉 ‘पुलिस राज’ की मानसिकता पर रोक लगाने के लिए
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